Thursday, September 2, 2010

स्वदेश प्रेम

जो पच पच करते होटों से |
कर सका धरा सिंगार नहीं ||

जों सड़क किनारे पौधों को |
कर सका अर्पण जलधार नहीं ||

जों मदद के भूखे प्यासे को |
दे सका उपदेश भरभार नहीं ||

जो चूस सका ना मच्छर बन |
इस भारत माँ की जान नहीं ||


जो चबा सका ना दीमक बन |
अपने स्वदेश की बुनियाद नहीं ||


जो मिला पानी को चूने में |
बेच सका दूध के दाम नहीं ||

जो गटर में उगती सब्जी का |
ले सकी जिह्वा गर स्वाद नहीं ||

जो सामने आती नारी के |
कर सका रूप का पान नहीं ||

जो राह में आते प्राणी पर |
कर सका शब्द बौछार नहीं ||

जो मिला सका मिठाइए में |
सड़ते गोबर का स्वाद नहीं ||

जो हस्पताल में रहकर भी |
कर सका किडनी व्यापार नहीं ||

जो बनके माता का रक्षक |
बन सका आज ध्रितराष्ट्र नहीं ||


जो बनके माता का सेवक |
कर सका दुशाशन सा काम नहीं ||


कहते चाचा उस भारत वासी को |

अपने स्वदेश से प्यार नहीं ||


भारत माता की जय | जय हिंद ||

~तरुण सुन्द्रियाल


~ इति ~

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